कुलगीत

वीणा बजा रही हैं, शेवताम्बरा यहाँ पर ।
खिलते मनुज सुमन हैं, मधुमय बिहान पाकर॥

शासन की दिव्य दृष्टि, बरसों सुमेघ बनकर ।
झूमी है डाली- डाली, बहता है ज्ञान निर्झर॥

संस्कृति यहाँ बिलसती, शिव शम्भु की जटा सी।
बहती हैं ज्ञान गंगा काशी परम्परा सी ॥

जिज्ञासु जन हैं आते, विज्ञान-ज्ञान पाने।
हो स्नात ज्ञान सर से, अज्ञान को मिटाने ॥

आधी उषा किरन है, प्राची दिशा से चलकर।
अँधियारा को मिटाती, नित नव प्रकाश भरकर॥

जागृत सरस्वती का, तप साधना सा सुखकर।
हमको यह विद्या मन्दिर, प्राणो से भी है बढ़कर॥

बलिदानियों कि प्यारी, माटी को सिर नवाकर।
अब हम करेंगें इसकी,शुचि कीर्ति को उजागर॥